Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 7
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 7 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
चिन्मात्रादमलाच्छून्यादृते किंचिन्न विद्यते ।
नान्यत्किंचिदपर्यन्ते खे शून्यत्वेतरद्यथा ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
परमार्थ वस्तु का अपनाप करनेवाले अज्ञान को बतलाने के लिए पहले पार्थ वस्तु का
कथन करते हैं /
द्वैतरहित निर्मल चैतन्यमात्र वस्तु को छोड़कर दूसरा कुछ भी पदार्थ जगत् में नहीं है,
क्योकि चैतन्य की सत्ता और चैतन्यप्रकाश इन दोनों से ही जगत् की सत्ता ओर जगत् का
प्रकाश होता है, यह स्वानुभव सिद्ध बात है । जैसे आकाश शून्यरूपता को छोडकर दूसरी
कोई वस्तु प्रसिद्ध नहीं है, वैसे ही असीम आत्मा में स्वतः सत्ता-स्फूर्ति को छोड़कर दूसरी कोई
चीज प्रसिद्ध नहीं है