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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । संवेदनं भावनं च वासना कलनेति च । अनर्थायेह शब्दार्थे विगतार्थो विजृम्भते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह मकि युनि ने अपने ससाररूफी अनर्थ का वर्णन कर जब उसके निरास का उपाय पूछा तब उसके कीजो को जाने बिना संसार निरास के उपाय ग्राप्त नहीं किये जा सकते“ इस अभिप्राय से सार के चार बीजों का महाराज वस्तिष्ठजी उपदेश देते हैं / महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे मुने, संवेदन, भावन, वासना और कलना ये चार ही इस संसार में अनर्थ पैदा करनेवाले हैं । ये जितने शब्दों के अर्थ हैं, वे मिथ्याभूत अर्थो काही अवलम्बन करते हैं और स्वयं भी मिथ्या हैं, इसलिए वे सब एकमात्र अविद्या में ही स्फुरित होते हैं । पहले पहले इन्द्रियों से जो विषयों का उपभोग होता है, यह उपभोग ही संवेदन कहलाता है, विषयों को जानने पर उनका जो बार-बार चिन्तन होता है, वह चिन्तन “भावन” कहलाता है, बार-बार चिन्तन करने पर चित्त में एक तरह का जो दृढ़ विषयलांछन उत्पन्न हो जाता है, वही विषयलांछन वासना कहलाती है और उस वासना से मरणकाल में भावी शरीर के लिए जो स्मरण होता है, उसको कलना कहते हैं

सर्ग सन्दर्भ

चौबीसवाँ सर्ग समाप्त पचीसवों सर्ग अविद्या से उत्पन्न संवेदन आदि चार संसार के बीज हैँ ओर परमात्मा का तच्चज्ञान ही संसार ओर उन बीजों का विनाशक है, यह वर्णन ।