Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 18
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 18 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
मिश्रीभूता अपि ह्येते जतुकाष्ठादयो यथा ।
मिथोऽननुभवे मिश्रा ऐक्यं ह्यनुभवे मिथः ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि यह शंका हो कि क्रिया ओर क्रियावान् एव! अवयव ओर अक्यकी इन दोनों का तो
समवायसम्बन्ध से केवल सम्मेलन ही मात्र होता है, न कि उनकी आत्यन्ति एकता होती हैं,
तो इसका समाधान यह है कि लाख ओर लकड़ी का बाहर से मिश्रण करने पर भी भेद के
अनुभव में मिश्रण दिखाई नहीं देता और इस स्थल में मिश्रण दिखाई पड़ता है इसलिए दोनों
में विषमता हैं और स्रमवायत्रिद्ध भी नहीं है, इस आशय से कहते हैं /
इन लाख, लकड़ी आदि के परस्पर मिश्रित हो जाने पर भी जैसे भेद का अनुभव होने के कारण
उनकी एकता नहीं है, वैसे यहाँ पर नहीं है, क्योंकि इनमें परस्पर ऐक्यरूप मिश्रण दिखाई देने से
इनमें एेक्य ही मानना चाहिए