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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 8

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 8

संस्कृत श्लोक

वेदनात्मा न सोऽस्त्यन्य इति या प्रतिभा स्थिरा । एषाऽविद्या भ्रमस्त्वेष स च संसार आततः ॥ ८ ॥

हिन्दी अर्थ

इस तरह चारों ओर निरन्तर प्रकाशित हो रहा “चिन्मात्ररूप वेदनात्मा देह-इन्द्रिय आदि से भिन्न नहीं है, इस प्रकार उसकी सत्ता का भान न करानेवाली अनादि जो प्रतिभारूप भ्रान्ति है, वह भ्रान्ति ही आवरणशक्ति की प्रधानता से अविद्या, विक्षेपशक्ति की प्रधानता से भ्रम ओर फलरूप से वस्तुतः संसाररूप हुई है