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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

सजातीयः सजातीयेनैकतामनुगच्छति । अन्योन्यानुभवस्तेन भवत्वेकत्वनिश्चयः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

जो एक जाति के पदार्थ हैं; वे ही एक दूसरे में मित्र जाने पर एकरुूप हो जाते हैं; यह बात जल के साथ जल के गिल जाने पर देखी गरड है, इस स्थिति मे जगत्‌ जब जयदनुभवरूप है ओर सभी अनुभव जब एकरूप हैं; तब तो अन्त में वौतन्य की एकता ही सिद्ध हुई. यह कहते हैं । जल आदि एक जाति के पदार्थ अपनी जाति के दूसरे जल आदि के साथ मिल जाने पर एकता को प्राप्त करते हैं, यह बात सिद्ध है। इसलिए अनुभव भी परस्पर मिल जाने से एकरूप हो जा सकते हैं, अतः चिदेकत्व निश्चय सिद्ध है