Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, Verse 11
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 25, verse 11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 25 · श्लोक 11
संस्कृत श्लोक
मृन्मयं तु यथा भाण्डं मृच्छून्यं नोपलभ्यते ।
चिन्मयादितया चेत्यं चिच्छून्यं नोपलभ्यते ॥ ११ ॥
हिन्दी अर्थ
(बिन््यात्रावमलाच्छून्यादते किविन्न विद्यते“ यह जो कल है इम्रका दृष्टांतों से उपपपादन करते हैं /
जैसे मिट्टी के बर्तन मिट्ठी से शून्य उपलब्ध नहीं हो सकते, वैसे ही सतूचिन्मात्रमय सांसारिक
विषय भी चिति से शून्य उपलब्ध नहीं हो सकते