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Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 179

एक सौ सतहत्तरवाँ सर्ग समाप्त एक सौ अठहत्तरवाँ सर्ग इस सर्ग में अमूर्तं (निराकार) चित्‌ द्वारा समूर्तं (साकार) जगत्‌ के परिचालन में युक्तिवर्णनपूर्वक एेन्दवाख्यान से जगत्‌ अमूर्तं चिन्मात्र ही है, यह सिद्ध किया गया है ।

29 verse-groups

  1. Verse 1धर्म आदि अमूर्त होने के कारण परलोक मे मूर्त देह के कारण नहीं हो सकते यह कथन सुनकर अमूर्त…
  2. Verse 2फूल, कपास (रु), मक्खन आदि अत्यन्त कोमल पदार्थ कठिन शिलाओं की नाई प्रतिघात के (टक्कर के) य…
  3. Verse 3इसी बात को लोकप्रस़िद्धि से स्पष्ट करते हैं। लोक में सप्रतिघ पदार्थो का तो परस्पर टकराना…
  4. Verse 4उनमें संवेदन नाम से प्रसिद्ध जो पदार्थ है वह अप्रतिघ ही है। क्योकि चन्द्रमा का निरीक्षण क…
  5. Verse 5यदि किये कि आपका यह आक्षेप प्रबुद्ध दृष्टि से है अथवा अप्रबुद्ध दृष्टि से है ? प्रथम पक्ष…
  6. Verse 6यद्यपि आशय में स्थित मूर्त प्राणवायु ही प्रवेश और निर्गमरूप वृत्तियों से क्षुब्ध होकर देह…
  7. Verses 7–8यदि कहा जाय कि जीवरूप चिदाभास ही प्राणवायु का क्षोभ पैदा करेगा, तो उस पर कहते है । जैसे ब…
  8. Verses 9–11जैसे बाहर का वायु लोहार की धौंकनी में भीतर प्रवेश करने ओर बाहर निकलने से धौकनी को चलाता ह…
  9. Verses 12–13यदि प्रश्न हो कि “शतं चैका च हृदयस्य नाउ्य:” (एक सौ एक हृदय की नाड़ियाँ है) इस श्रुति में…
  10. Verse 14कार्यकारण की स्वामिनी भोग करनेवाली जीवसंवित्‌ का जिसमें अनादि प्रवाह से प्राप्त काम, कर्म…
  11. Verses 15–19श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, शरीर में स्थित वायु, अँतड़ी आदि सब कुछ सप्रतिघ (साकार…
  12. Verse 20इस प्रकार श्रीरामजी की ओर से आक्षेप होने पर श्रीवसिष्ठजी पूर्वोक्त गुढाभिसन्धिवाला उत्तर…
  13. Verses 21–25श्रीरामचन्द्रजी, आपने जो अनेक आक्षेप किये हैं वे लागू हो सकते यदि हम प्रपच को सप्रतिघ ओर…
  14. Verse 26चिन्मात्र ही सर्व जगत्‌ है, मूर्त कुछ भी नहीं है, इस विषय में पूर्वोक्त एन्दवाख्यान को पु…
  15. Verse 27प्रस्तुत प्रश्न के पूर्णतया समाधानरूप प्रयोजनभेद से भी इसकी पुनरुक्ति दोषावह नहीं है, यह…
  16. Verses 28–31उत्पत्ति-प्रकरण में वर्णित ही आकार-प्रकार से युक्त किसी जगज्जाल में तपस्या और वेद-प्रतिपा…
  17. Verse 32उनके वियोगजन्य दुःख से व्याप्त हुए उनके उन पुत्रों ने उनका ओध्वदेहिक संस्कार कर लोकव्यवहा…
  18. Verses 33–44धारणाओं मेँ से (विषयविशेष आकारित मन की स्थिरतारूप धारणाओं मे से) किंविषयिणी (किसमें बाँधी…
  19. Verses 45–48ऐन्दव जगतो की तुल्यता प्रस्तुत जगत्‌ में भी समझनी चाहिए, ऐसा कहते है । जैसे आकाश में चिन्…
  20. Verse 49चिन्मात्रआकाशरूप कुम्हार द्वारा अपने शरीररूपी चंचल (घूम रहे) चाक में अपने शरीररूपी मिट्टी…
  21. Verse 50इस कथन से कथं सचेतना एते काष्ठलोष्टोपलादयः” इस प्रश्न का भी समाधान हो गया, इस आशय से कहते…
  22. Verse 51अनुभव, स्मृति ओर स्मृतिजनक संस्कार, इच्छा और कृति ये सब संविद्विशेष अर्थ विषयक हैं। इनके…
  23. Verses 52–53इस कारण भी काष्ठ, लोहा आदि सचेतन हैं, ऐसा कहते हैं। चूँकि वह परम चिद्धाम ही सर्वात्मक संव…
  24. Verses 54–56जैसे ढालू जमीन पर प्रवृत्त हुआ जल परात्मीयरूप अन्यकारण के बिना अपने ही अतितीव्र यत्न से स…
  25. Verse 57अतएव तृण, काष्ठ, शैल आदि को अचेतन समझनेवाले मूढ़ों का विद्वान्‌ लोग उपहास करते हैं, ऐसा क…
  26. Verse 58ब्रह्मा के संकल्प से जन्य होने के कारण भी अपने मनोराज्य के तुल्य जगत्‌ की चिन्मात्रता का…
  27. Verses 59–62यह प्रपंचदृष्टि दृढ़ की गई दिगदृष्टि से ज्यों-ज्यों देखी जाती है त्यों-त्यों यह दुःख शीघ्…
  28. Verse 63अतएव महाफलवती होने के कारण इस दृष्टि को दढ करना चाहिये, यों सर्ग का उपसंहार करते हैं । इस…
  29. Verse 64यही जब अमुक्तरूपी संसारी था तब इसके असंख्य हाथ चारों ओर से भरे थे, असंख्य आँख, कान, सिर,…