Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 28–31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 28–31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 28-31
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
उत्पत्ति-प्रकरण में वर्णित ही
आकार-प्रकार से युक्त किसी जगज्जाल में तपस्या और वेद-प्रतिपादित आचार-विचार का आधारभूत
"इन्दु" नाम से प्रख्यात कोई ब्राह्मण हुआ। उसके ब्रह्माण्डोदरवर्ती आकाश के दस दिकृतटों की तरह
महानों और सज्जनों के आस्पदभूत (आश्रयभूत) महात्मा महाशय दस पुत्र हुए। जैसे दसों के मध्य में
ग्यारहवें भगवान् रुद्र महाप्रलय में अन्तर्धान को प्राप्त होते हैं वैसे ही उन दसों का पिता इन्दु कालवश
अन्तर्धान को प्राप्त हो गया । उसकी अनुरागवती भार्या ने वैधव्य के कष्टों से जैसे तारारूपी चंचल
नेत्रवाली अनुरागवती (लालिमापूर्ण) सन्ध्या दिन का अनुगमन करती है वैसे ही उसका अनुगमन
किया