Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 54–56
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 54–56 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 54-56
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
जैसे ढालू जमीन पर
प्रवृत्त हुआ जल परात्मीयरूप अन्यकारण के बिना अपने ही अतितीव्र यत्न से स्वतः ही आवर्त, प्रवाह,
तरंग आदि की विचित्रता से बहता है वैसे ही सृष्टि के उन्मुख चिति भी परात्मीयरूप अन्य कारण के
बिना अपने ही अतितीव्र यत्न से स्वतः ही सृष्टिरूप से बहती हे । जैसे पाद्मकल्प में भगवान की
नाभिकमल-लीला ही जगतों की तरह स्फुरित होती है, इसलिए भी वे ब्रह्म से तनिक भी भिन्न नहीं ह ।
इसलिए यह जगत् अनुत्पन्न, अनिरुद्ध, सन्मात्र, शान्त, भाव और अभाव दोनों का ही मार्जन होने से
उनका मध्यरूप, चिदाकाशभूत, चिद्भानमात्र हे