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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 15–19

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 15–19 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 15-19

संस्कृत श्लोक

संविदाकाश एवायं देहः स्वप्न इवोदितः । स्वप्नाद्रिवन्निराकारः स्वानुभूतिस्फुटोऽपि च ॥ १५ ॥ संवित्तिरेवानुभवात्सैवाननुभवात्मिका । द्रष्टृदृश्यदृशा भाति चिद्व्योमैकमतो जगत् ॥ १६ ॥ वेदनावेदनात्मैकं निद्रास्वप्नसुषुप्तवत् । वातस्पन्दाविवाभिन्नौ चिद्व्योमेकमतो जगत् ॥ १७ ॥ द्रष्टा दृश्यं दर्शनं च चिद्भानं परमार्थखम् । शून्यस्वप्न इवाभाति चिद्व्योमैकमतो जगत् ॥ १८ ॥ जगत्त्वमसदेवेशे भ्रान्त्या प्रथमसर्गतः । स्वप्ने भयमिवाशेषं परिज्ञातं प्रशाम्यति ॥ १९ ॥

हिन्दी अर्थ

श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुनिवर, शरीर में स्थित वायु, अँतड़ी आदि सब कुछ सप्रतिघ (साकार) है उसको अप्रतिघ निराकार जीवसंवित्‌ कैसे संचालित करेगी ? यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये । यदि अप्रतिघाकार संवित्‌ सप्रतिघरूप देह आदि का संचालन करेगी, तब तो दूर स्थित भी जल प्यासे पथिक की इच्छा से स्वयं ही आ जायेगा । यदि सप्रतिघ और अप्रतिघ पदार्थो का परस्पर संश्लेष हो तब तो इच्छा ही बाहर बोलना, लेना, देना, विहार आदि करेगी फिर कर्मेन्द्रियों से कहाँ पर क्या होगा ? हे मुनिवर, जैसे सप्रतिघ (प्रतिघातयोग्य) ओर अप्रतिघ का (प्रतिघात के अयोग्य का) बाहर श्लेष (संपर्क) नहीं है वैसे ही भीतर भी उनका श्लेष नहीं है ऐसा मैं मानता हूँ। अर्थात्‌ बाहर उनका श्लेष न होने पर भी भीतर श्लेष हो ऐसा मेरा मत नहीं है । इस प्रकार आपसे समाधान में दी गई युक्तियों का खण्डन हो जाने पर अन्य युक्तियाँ आप दीजिये । खंडित युक्तियों को ही बार-बार मत दुहराइये। अथवा आप योगिराज हैं आपको स्वयं जैसे इसका (अमूर्त का ही मूर्त से सम्पर्क का), जो लोक में अत्यन्त अप्रसिद्ध है, योगबल से जिस उपाय से अनुभव होता है उसे मुझसे शीघ्र कहने की कृपा कीजिये