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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 63

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verse 63 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 63

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

अतएव महाफलवती होने के कारण इस दृष्टि को दढ करना चाहिये, यों सर्ग का उपसंहार करते हैं । इस जगत्‌ में न आकृति है, न संसार है, न असंसार (मोक्ष) है, न जन्म है, न नाश है, न दूसरा कोई भावविकार है और न उसका अभाव है, परमार्थ चित्स्वभाव आत्मा में इस तरह परम शान्त ब्रह्म का स्फुरण होता है अथवा ब्रह्म से अतिरिक्त स्फुरण भी यहाँ सर्वथा नहीं है ॥६ २॥ यदि कोई कहे कि स्फुरण के भी अभाव में ब्रह्म कैसे स्थित रहता है ? तो इस पर कहते हैं। यद्यपि वह ब्रह्म स्फटिक के स्तम्भ की नाईं आकाशरहित अनेकों सृष्टिरूपी पुतलियों की राशि से भरा हुआ है तथापि उसमें जगत्रूपी लताएँ, उनकी चोटियाँ, उनकी जड़, उनकी रचनाएँ और उनकी जड़ों का भूमि में प्रवेश ये सब अलभ्य हैं वह आदि-अन्त विहीन है, काल से भी उसके जन्म और नाश नहीं होते, वह पूर्णरूप से अत्यन्त निर्मल है ऐसा वह चिदानन्दैकघन नित्यकैवल्यरूप स्थित है