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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 45–48

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 45–48 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 45-48

इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।

हिन्दी अर्थ

ऐन्दव जगतो की तुल्यता प्रस्तुत जगत्‌ में भी समझनी चाहिए, ऐसा कहते है । जैसे आकाश में चिन्मय ये एेन्दव जगत्‌ हैं वैसे ही इन प्रस्तुत जगतां मे भी काठ, ढेले, पत्थर आदि चिन्मय ही हँ । जैसे ऐन्दवों के संकल्प जगत्ता को प्राप्त हुए वैसे ही ब्रह्मा का यह संकल्प भी जगत्ता को प्राप्त हुआ है । इसलिए ये पर्वत, पृथिवी, वृक्ष, बादल, आकाशादि पंचमहाभूत ये सब कुछ चिन्मात्रमय ही विस्तृत हैँ । जैसे उन ऐन्दव जगतों मे सब कुछ चित्‌ ही था वैसे यहाँ पर भी वृक्ष चित्‌, है, पृथिवी चित्‌ हे, द्युलोक चित्‌ है, आकाश चित्‌ है और पर्वत चित्‌ हैं, कहीं पर भी अचित्‌ संभव नहीं हे