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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 4

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verse 4 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सर्वं संविन्मयं शान्तं सत्स्वप्न इव जाग्रति । स्थितमप्रतिघाकारं क्वासौ सप्रतिघा स्थितिः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

उनमें संवेदन नाम से प्रसिद्ध जो पदार्थ है वह अप्रतिघ ही है। क्योकि चन्द्रमा का निरीक्षण कर रहे पुरुष के यहाँ से नयन-रश्मियों का अनुगमन करनेवाले चित्‌ के साथ चित्तउपहित संवेदन चन्द्रमण्डल में बिना आघात के (टक्कर के) ही गिरते हैं, इसलिए वे अमूर्त हँ । यह सभी चन्द्रदर्शियों द्वारा अनुभूत होता है