Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 12–13
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 12–13 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 12,13
संस्कृत श्लोक
एकः सहस्रं भवति यथा ह्येते किलैन्दवाः ।
प्रयाता भूतलक्षत्वं संकल्पजगतां गणैः ॥ १२ ॥
सहस्रमेकं भवति संविदां च तथा हि यत् ।
सायुज्ये चक्रपाण्यादेः सर्गैरेकं भवेद्वपुः ॥ १३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि प्रश्न हो कि “शतं चैका च हृदयस्य नाउ्य:” (एक सौ एक हृदय की नाड़ियाँ है) इस श्रुति में
चारों ओर फैली हुई सौ नाड़ियाँ सुनी जाती हैँ । एक सौ नाड़ियों की प्रत्येक शाखा से बहत्तर बहत्तर
नाडिर्यो निकली हैं यो हजारों नाडियाँ होती हैं, उनमें व्यान“ नामक वायु का संवार होता है। उन
सकल नाडयो में व्यान वायु के संचार को देहादि के संचलन में निमित्त मानें तो सदा ही सर्वाग का
संचलन होना चाहिये एक एक हस्त, पाद आदि का व्यापार नियत नहीं होना चाहिये । यदि कहिये एक
अंग का उद्यम न होने में सौ की सौ नाड्यो उस अंग में एक हो जाती है, सवगि का संचलन उपस्थित
होने पर एकाकार भी सौ नाडियाँ सवगि व्यापिनी हो जाती हैं, तो उस पर भी कहते हैं।
समय विशेष पर यानी एक एक अंग के चालन के समय सौ नाड़ियाँ कैसे एक हो जायेगी और समय
विशेष पर यानी सर्वांग के चालन के समय कैसे एक नाडी सौ हो जायेंगी तथा दूसरी बात यह भी है कि
अमूर्त चैतन्य का संश्लेष देह में भी नहीं है। आध्यासिक सम्बन्ध तो काष्ठ, लोष्ट आदि में भी तुल्य है,
इसलिए उन्हे भी सचेतन कहना चाहिये । और वह कैसे संभव है ? लोक में जंगम पदार्थ ही क्यों
स्पन्दयुक्त होते हैं ? वृक्ष, लता, काष्ठ, पाषाण आदि स्थावर वस्तु यदि चेतन है, तो उसमें स्पन्दन
क्यों नहीं होता ? वह देह के समान भोग के उपयोग से चमत्कृत भी क्यो नहीं होती, नियन्त्रण करनेवाले
कुलाल ( कुम्हार) आदि से अधिष्ठित चक्र आदि की तरह नियतकाल मेँ ही स्पन्दनवाली क्यों होती
है ? यह मुझसे कहने की कृपा कीजिये