Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 51
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verse 51 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 51
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
अनुभव, स्मृति ओर स्मृतिजनक संस्कार, इच्छा और कृति ये सब
संविद्विशेष अर्थ विषयक हैं। इनके अन्दर अर्थ प्रतीत होता है और ये अपने अन्दर अभिव्यक्त चिन्मात्र
को ही धारण करते हैं। जड़ अर्थ को धारण नहीं करते, इसलिए अर्थ चिद्रूप ही हैं। हम इस बात पर पहले
ही विचार कर चुके हैं कि अर्थशून्य कल्पनाओं की अन्य ही स्थिति है और तत्त्व के अवगाहन के चमत्कार
से शोभित होनेवाली कल्पना आदि का अन्य ही चमत्कार है।
अथवा यो दूसरा अर्थ करना चाहिये - यदि कोई कहे लोहा आदि की अनुभव, स्मृति ओर स्मृतिजनक
संस्कार मेँ एकरूपता है, इसलिए लोहा आदि अचिद्रूप ही हैं फिर उनको सचेतन कैसे कहते हैं, तो इस
प्रश्न पर कहते हैं।
कलन (अनुभव) आदि चिन्मात्र लौह, शैल आदि तत्त्व को अपने उदर में धारण करते हैं, किन्तु
उसका अवगाहन नहीं कर सकते, क्योकि वह कल्पना आदि के उत्थान से पहले से ही है, इस विषय का
हम पहले परामर्श कर चुके हैं। अज्ञात विषय में चक्षु आदि से अनुभव होता है ज्ञात विषय में स्मृति ओर
संस्कार होते हैं। इसलिए इनसे पहले अज्ञात विषय की सिद्धि अवश्य माननी होगी । अचित्रूप तृण,
काष्ठ, शैल आदि अज्ञात नहीं कहे जा सकते, क्योंकि जड़ों में अज्ञानरूपी आवरण का कोई प्रयोजन
नहीं है, अतएव जड़ों से अन्य ही ब्रह्मसत्ता तृण आदि की तत्त्वभूत है उसी का कलन, स्मृति ओर
संस्कारों से जड़त्वरूप से विमर्श होता है