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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 14

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verse 14 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

एक एव भवत्यब्धिः स्रवन्तीनां शतैरपि । एक एव भवेत्काल ऋतुसंवत्सरोत्करैः ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

कार्यकारण की स्वामिनी भोग करनेवाली जीवसंवित्‌ का जिसमें अनादि प्रवाह से प्राप्त काम, कर्म और वासना से प्रयुक्त तादात्म्यअध्यास है, उसके चालन में आध्यास्रिक स्वतादात्म्यशाली प्राण के संश्लेष से वह स्वतन्त्र है अन्य जगह परतन्त्र है इस तरह की व्यवस्था है, यो गूढ अभिप्राय से वसिष्टजी उत्तर देते हैं। जैसे बाहर लोहार धौकनी को संचालित करता है वैसे ही जीव संवित्‌ अन्दर आन्त्रवेष्ठन को (हड्डी-समूह को) संचालित करती है, उसके अनुसार ही लोक में सब लोग बाहर चेष्टा करते हैं