Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
क्व देहावयवाः क्वान्त्रवेष्टनी क्वास्थिपञ्जरम् ।
व्योमेवाप्रतिघं विद्धि देहं सप्रतिघोपमम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि किये कि आपका यह आक्षेप प्रबुद्ध दृष्टि से है अथवा अप्रबुद्ध दृष्टि से है ? प्रथम पक्ष में तो
मूर्त प्रसिद्ध ही नहीं है और दूसरे पक्ष में अमूर्त चिति देह आदि को प्रवर्तित करती है यह अप्रसिद्ध है,
क्योकि देह से लेकर अहंकारपर्यन्त सम्मिलित समुदाय का ही व्यवहारी लोगों को आत्मरूप से अनुभव
होता है ऐसी शंका उठाकर कहते हैं।
अर्धप्रबुद्ध लोगों के (दूसरी तीसरी भूमिका के बीच के लोगों के) संकल्प विकल्परूप दवेत से कल्पित
इस जगत् को मानकर मैं आक्षेप करता हूँ, बोधदृष्टि से परिशिष्ट चिन्मात्र मानकर आक्षेप नहीं करता
हूँ