Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verse 64
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verse 64 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 64
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यही जब अमुक्तरूपी संसारी था तब इसके असंख्य हाथ चारों ओर से भरे थे, असंख्य आँख, कान,
सिर, कण्ठ, उदर, पैर आदि अंग थे । मुक्तरूप तो आत्माकाशरूप, सुस्तम्भरूप, सन्मात्र अज मौन
यह मेँ ही हो गया, इसलिए फिर विकल्पों से कोई प्रयोजन नहीं हे