Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 9–11

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 9–11 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 9-11

संस्कृत श्लोक

कारणेन विना कार्यं सद्वदित्युपपद्यते । यथाभावितमेवार्थं संविदाप्नोत्यसंशयम् ॥ ९ ॥ यथा संभवति स्वप्ने सर्वं सर्वत्र सर्वथा । चिन्मयत्वात्तथा जाग्रत्यस्ति सर्वात्मरूपता ॥ १० ॥ सर्वात्मनि ब्रह्मपदे नानानानात्मनि स्थिता । अस्त्यकारणकार्याणां सत्ता कारणजापि च ॥ ११ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे बाहर का वायु लोहार की धौंकनी में भीतर प्रवेश करने ओर बाहर निकलने से धौकनी को चलाता है वैसे ही प्राणवायु में भी कण्ठनाली के छिद्र के संकोच और विकास से अनुमित अपने प्रवेश ओर निमि से देह आदि का चालकत्व प्रत्यक्ष है हृदय आदि प्रवेश में भी यों ही उसकी संचालकता समझनी चाहिये यों श्रीवसिष्ठजी गूढ अभिप्राय से समाधान करते है। श्रीवसिष्ठजी ने कहा : वत्स श्रीरामचन्द्रजी, देह में, हृदय में स्थित नाडी जब संकोच ओर विकास को प्राप्त होती है तब प्राण गले के छेद से बाहर आता है और भीतर जाता हे । जैसे छिद्र मेँ रहनेवाले यानी छिद्रवान्‌ सकल द्रव्यो के अन्दर संचार करनेवाला वायु बाहर स्थित लोहार की आजीविका की साधनभूत धौंकनी में प्रवेश करता है ओर बाहर निकलता है वैसे ही वायु प्रवेश ओर निर्गम से हृदय में स्पन्दन पैदा करता हे । श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : भगवन्‌, जैसे बाहर स्थित धौंकनी को लोहार उसके संकोच ओर विकासो से युक्त करता है वैसे ही भीतर स्थित नाडी को कौन परिचालित करता है ? भाव यह है कि यद्यपि वायु परिचालन करता है तथापि लौहार आदि चेतन से अधिष्ठित धौकनी में ही वह उस तरह स्पन्द पैदा करता है अन्यत्र नहीं करता इसलिए चेतन को ही अचेतन के नियत व्यवहार चेष्टा में निमित्त अवश्य कहना चाहिये