Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, Verses 33–44
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 179, verses 33–44 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 179 · श्लोक 33-44
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
धारणाओं मेँ से
(विषयविशेष आकारित मन की स्थिरतारूप धारणाओं मे से) किंविषयिणी (किसमें बाँधी गई) धारणा
उत्तम सिद्धि देनेवाली होगी । हम लोग यन्मय (यत्स्वरूपः) होकर सबके अधिपति हो जायेगे । ऐसा
विचार कर उन दसों ने वहाँ निर्विघ्न कन्वरा के मध्य में पद्मासन बोधकर यह विचार किया । ब्रह्मा से
अधिष्ठित सकल जगत् की धारणा से (ब्रह्मा से अधिष्ठित सकल जगत् के आकार से आकारित मन की
स्थिरतारूप धारणा से) स्थिर (निश्चल) हुए हम लोग बिना किसी विघ्न बाधा के ब्रह्माधिष्ठित जगद्रूप
हो जायेंगे। यह सोच विचार ब्रह्मयुक्त जगत् की धारणा से निमीलित नेत्र कमलवाले वे चिरकाल तक
चित्रलिखित ऐसे बैठे रहे इसके पश्चात् जब पूरे अठारह महीने तक ब्रह्मासहित जगत् की धारणा में
वधे हुए चित्तवाले वे मन के अन्यवृत्तिधारण द्वारा उससे च्युत न होकर स्थित रहे तब उनके शरीर
सूखकर हड्डी हड्डी हो गये, मांसाहारी जीव नोच नोचकर उनके अवयवो को खा गये अतएव प्रकाश
द्वारा नष्ट किये गये छायाभाग की तरह उनके शरीर वहाँ पर नष्ट हो गये । मैं ब्रह्मा हूँ, मैं यह जगत् हूँ,
मैं यह भुवनो से पूर्ण सृष्टि हूँ यों ध्यान कर रहे उनका महान् काल व्यतीत हुआ । उसके पश्चात् ध्यान
के परिपाक से देहरहित वे दस चित्त पृथक् पृथक् दस ब्रह्माण्डरूप जगत् बन गये, क्योकि जैसा पुरुष
का ध्यान होता है वैसा ही बन जाता है यह बात तत्क्रतुन्याय से प्रसिद्ध है । इस प्रकार एेन्दवों की चित्
ही इच्छा बनकर सम्पूर्ण जगत् बन गई । आकार से रहित अत्यन्त निर्मलरूप ही वह स्थित रही यानी
अपने स्वभाव के कुछ त्याग से जगत् नहीं बनी किन्तु निर्मल चित्स्वभावरूप से ही स्थित रही । यों सब
जगतों की संविद्रूपता सिद्ध हुई । जगतो के संवित्रूप होने से उनके वे भूमि, पर्वत, नदी आदि सभी को
आप चिदात्मक ही जानिये । यदि उनका दस प्रकार का त्रिजगज्जाल चिदात्मक नहीं है तो क्रियात्मक
है ? आप ही किये । वह संविदाकाश शून्यत्वमात्र ही है उससे अन्य नहीं है । जैसे तरंग जल के सिवा
अन्य कुछ नहीं हे वैसेही अचल आदि संवित्तत्त्व के सिवा अन्य कुछ नहीं हे