Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2) · Sarga 144
45 verse-groups
- Verse 1एक सौ बयालीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ तैंतालीसवाँ सर्ग पाण्डित्य की प्रशंसा तथा चिन्मात्रदर्…
- Verses 2–5सकल पारलौकिक सुख भी पण्डित को प्राप्त होनेवाले आत्मसुखरूपी महासागर में जलकण से भी लघु है,…
- Verse 6तो क्या देहसर्गादवि-शान्ति ब्रह्म स्वभाव से अतिरिक्त उत्पन्न होती है, इस पर नहीं ऐसा कहते…
- Verse 7ऐसा क्यो होता है ? इस शंकापर चूँकि परिशिष्ट ब्रह्म दृश्यक्षय नामका धर्मकर्म से शून्य है,…
- Verse 8दृश्य का न तो भूतकाल में अस्तित्व था, न वर्तमान में है और न भविष्य में रहेगा, यों त्रैकाल…
- Verse 9ब्रह्म का जो प्रतिभास (झलक) है, वह यह जगत् कहलाता है । इसी से समझ लीजिये कि वे पृथिवी आद…
- Verse 10जैसे स्वप्न देखनेवाले दिखाई देनेवाले स्वप्नलोक के मनुष्यों के पिता आदि कारण काल्पनिक हैँ…
- Verses 11–21पिता आदि की तरह उनके कर्म आदि भी अवास्तविक ही हैं, ऐसा कहते हैं। जैसे स्वप्नलोक के पुरुषो…
- Verse 22जैसे पुरुष ने नगरी के अन्दर मिट्टी, घडा आदि पदार्थो की कार्य- कारणता की कल्पना कर रक्खी ह…
- Verse 23जगत् की सत्यता का भंग होनेपर स्वाप्न वस्तुओं की प्रकृति के समान जगत् का चिन्मात्र में ह…
- Verse 24जैसे तुम अपने स्वप्ननगर की कल्पना करते हो वैसे ही ब्रह्म ने सृष्टि के आरम्भ में कार्यकारण…
- Verse 25तुमने भी अपने संकल्पनगर में स्वेच्छानुसार कार्यकारणरूपिणी व्यवस्था कर रक्खी है, यों सिद्ध…
- Verse 26संकल्पनगर ओर उसकी अन्दरूनी व्यवस्था केवल चिदाकाश का विकास ही तो हे, यह बात अपने अनुभव से…
- Verse 27हृदय में स्थित संकल्प-नगर में चिदादित्य की (चितूसूर्य की) स्वप्रकाशतारूप अवस्था सदैव रहती…
- Verse 28“स भूरिति व्याहरत्" (उसने “भू उच्चारण किया ओर भुवन की सृष्टि की) इत्यादि श्रुतियों के अन…
- Verse 29इसी प्रकार गऊ घडा आदि सवमें समझना चाहिये, ऐसा कहते है। जो चिदाकाश की शून्यता झटपट जिस वस्…
- Verse 30जिसका मन से ध्यान करता है, उसका वाणी से उच्चारण करता है, इस श्रुति के अनुसार पहले रूपकल्प…
- Verse 31हे सौम्य, जैसे वायु में स्थित स्पन्दसत्ता का वायु से अतिरिक्त स्वरूप नहीं है उससे अभिन्न…
- Verse 32इससे सिद्ध हआ कि चिद्घनताका ही भ्रान्त लोगों की दृष्टि में जगत् के रूप में स्फुरण होता ह…
- Verse 33कब ब्रह्म में सृष्टि का अभाव ज्ञात होता है ? ऐसा प्रश्न उठनेपर कहते हैं। जब कठिनाई के साथ…
- Verse 34ऐहलौकिक सृष्टि के समान पारलौकिक सृष्टि भी ऐसी ही है, ऐसा कहते है । वह मरकर स्वप्न की तरह…
- Verse 35व्याध ने कहा : हे मुनिवर, इस देहके छूट जाने के बाद अन्य देह कैसे उत्पन्न होती है उसका कौन…
- Verses 36–39जो लोग यह मानते हैं कि धर्माधर्म ही स्वभोगार्थ करते हैं, उनके मत में कर्मनिर्मित की ज्ञान…
- Verse 40संस्काररूप से विहित और निषिद्ध के आचरण धर्म ओर अधर्म कहलाते हैं; संस्कार-पुँज ही मन है, च…
- Verses 41–42पिता आदि अथवा इश्वर मरे हुए का पुनः निर्माण करते हैं, इस युक्ति का खण्डन करते है। यदि कोई…
- Verse 43उसी भाव की अभ्यासवश जब स्पष्ट प्रतीति होती है तब लोक और वेद में उसीमे जन्मव्यवहार होता है…
- Verses 44–45आकाशात्मा उसी में आकाशरूप स्वप्नतुल्य दृश्य का अभ्यास करता हुआ फिर स्मरण की कल्पना करता ह…
- Verse 46इस प्रकार कोटि कोटि जगत् हैं। यदि उनका रहस्य तत्त्व जान लिया जाय तो वे सब ब्रह्मरूप ही ह…
- Verses 47–48उक्त कोटि-कोटि जगतों द्वारा किसी का कुछ भी आवृत नहीं हुआ । वास्तव में वे हैँ ही नहीं । उन…
- Verse 49इसलिए ज्ञानी ओर अज्ञानी की दृष्टि में सत्य ओर असत्य परस्पर विपरीत है यानी जिसको ज्ञानी सत…
- Verse 50अथवा सत्य ओर असत्य दोनों ही परमार्थ सत्य चित् मे भानरूप होने से सब कुछ सत्य ही है, अतः ज…
- Verses 51–53अथवा जिसके प्रति जव जिस जगत् का भान होता है, उसके प्रति तव वह सत्य है, यह सत्यता की व्यव…
- Verse 54इसलिए परिशेष रहने से यदि ज्ञान ही ज्ञेय है तो यह प्रपंच ज्ञान से अतिरिक्त स्थित नहीं हे ।…
- Verse 55इसलिए जो ज्ञान है वही ज्ञेय है, क्योकि ज्ञान से अतिरिक्त ज्ञेय का संभव नहीं हे, अतः ज्ञान…
- Verses 56–57जिनकी पृथक् सत्ता नहीं है ज्ञानरूप से ही जो सत्तावाले हैं ऐसे सर्गो को देख रहे तत्त्वज्ञ…
- Verses 58–62देखिये न, एक चिन्मात्र ही स्वप्न में लाखों लाखों रूप बनकर रहता है स्वप्न से सुषुप्ति मेँ…
- Verse 63चूँकि संवित्, जो आकाशरूप ही है, पृथिवी आदि नामवाली प्रतीत होती हे, इसलिए यह संविद्रूप ही…
- Verse 64संवित् विनाशी मूर्तं पदार्थ की तरह भासती है ओर अविनाशी अमूर्तं की तरह भी वही भासती हे ।…
- Verse 65हे व्याध, तुम मन से पूर्वं दिशा ओर पश्चिम दिशा को चिरकाल तक जाते हो, वहाँपर दृष्ट, श्रुत…
- Verse 66यदि शंका उठे कि बहुत से जीवचित् के संकल्प मोघ (निष्फल) देखे जाते है, वही संवित् का विना…
- Verses 67–71अदृढ (निर्बल) संकल्प अदृढ ही मनोरथमय दिगन्तगमन और वहाँ के पदार्थो का दर्शन आदि करता है और…
- Verse 72यदि चित् ही शरीर आदि के आकार से विद्यमान है तो शरीर के विनाशी या साकार होने से चित् में…
- Verse 73यदि किसी को यह शंका उठे कि शरीर का नाश होनेपर उसके साथ जीव नष्ट नहीं हुआ यह केसे मालूम हो…
- Verse 74जो म्लेच्छ देशों में मरे ओर जलकर राख हो गये वे यहाँ आकर अपना वृत्तान्त कहकर फिर चले जाते…
- Verses 75–83पिशाच को देखना उसके साथ बातचीत करना यह सब जीवित भूतवेद्य का ही धर्म है आगमन या संभाषण मरे…