Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 30
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
अहं चित्परमाण्वात्मा तेन चित्परमाणुना ।
एकतामागतो वारि वारिणेव तदीक्षणात् ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
जिसका मन से ध्यान करता है, उसका वाणी से उच्चारण करता है, इस श्रुति के अनुसार पहले
रूपकल्पना की गई, उसके पश्चात् नाम की कल्पना हुई, ऐसा कहते है।
संकल्परूपी सृष्टि-सा मालूम पडनेवाले इस एकमात्र चित्चमत्कार में पहले पदार्थो की सृष्टि
होती है उसके पश्चात् सृष्टि आदि नाम पडते हैं