Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 41–42
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verses 41–42 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 41,42
संस्कृत श्लोक
तद्ब्रह्मैव निराकारं चिद्रूपत्वात्स्फुरद्वपुः ।
साकारमिव भातात्म भूत्वा स्थावरजंगमम् ॥ ४१ ॥
देवर्षिमुनिभारूपं करोति नियतिं क्रमात् ।
विधींश्च प्रतिषेधांश्च देशकालक्रियादिकान् ॥ ४२ ॥
हिन्दी अर्थ
पिता आदि अथवा इश्वर मरे हुए का पुनः निर्माण करते हैं, इस युक्ति का खण्डन करते है।
यदि कोई दूसरा-पिता अथवा ईश्वर-मृत की सृष्टि करता हे, तो वही यह है एसी प्रत्यभिज्ञा
केसे होगी ? क्योकि "तत्सृट्वा तदेवानुप्राविशत्" (उसकी सृष्टिकर उसी मेँ प्रवेश कर गया) इस
श्रुति से निर्माणकर्ता के ही प्रवेश का श्रवण है । यदि कहो कि इष्टापत्ति है, तो उसकी स्तनपान आदि
प्रवृत्ति के अनुरूप स्मृति कैसे होगी ? पूर्वसिद्ध आत्मा का ही अवलम्बन करके उत्पन्न हुए में जो
चेतनत्व प्रसिद्ध है वह भी शून्य ही हे । इससे सिद्ध हुआ कि मृत्यु होने के बाद फिर उत्पन्न नहीं होता,
किन्तु केवल चित्त से ही यहाँपर यह मैं इस प्रकार उत्पन्न हुआ हूँ यों जन्मादि विकारशून्य आत्मा
में कल्पना द्वारा जानता हे