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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 1

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 1

संस्कृत श्लोक

मुनिरुवाच । सर्वथाभावभावेषु स्वप्नसंवेदनात्मसु । नित्याप्रतिघरूपेषु किं बद्धं किं विमुच्यते ॥ १ ॥

हिन्दी अर्थ

एक सौ बयालीसवाँ सर्गं समाप्त एक सौ तैंतालीसवाँ सर्ग पाण्डित्य की प्रशंसा तथा चिन्मात्रदर्शन ही पाण्डित्य है यह कथन-पूर्वक चित्‌ ही जगत्‌ है, इसका युक्ति द्वारा पुनः समर्थन | श्रीमुनि ने कहा : हे व्याध, कमलो को खिलाने के निमित्त जैसे सूर्य आकाश का अलंकार हे वैसे ही सम्पूर्ण धर्मो के निर्णय में, धर्म से अविरुद्ध लौकिक कर्मो के निर्णय में तथा धर्म और सत्कर्मो के फलभूत एेहिक ओर पारलौकिक सुखों के तारतम्य के निरूपण में सन्देह रूपी ग्रन्थि को सुलञ्माकर श्रोता की बुद्धि को विकसित करनेवाला पण्डित (ज्ञानी) ही सभा का अलंकार है