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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 6

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 6 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 6

संस्कृत श्लोक

यथेदं नो जगत्तद्वच्छतानां खे शतानि हि । नृणां पश्यन्तु तेषां तु नान्योन्यमनुभूतयः ॥ ६ ॥

हिन्दी अर्थ

तो क्या देहसर्गादवि-शान्ति ब्रह्म स्वभाव से अतिरिक्त उत्पन्न होती है, इस पर नहीं ऐसा कहते हैं । ब्रह्म स्वतत्त्वज्ञान से ही ब्रह्मरूप स्वभाव में जो स्थित है उसी की स्वयं उसी ने स्वस्वभावरूप देह- सर्ग-क्षयादि संज्ञाएँ की हैं, यह परमार्थ है