Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 36–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 36
संस्कृत श्लोक
अकारणानां भावानामत्यन्तासंभवादिह ।
क्वचित्सप्रतिघः सर्गो न संभवति कश्चन ॥ ३७ ॥
ब्रह्मेदमित्थमाभाति भास्वरं चित्स्वभावतः ।
सर्गादिशब्दपर्यायमाद्यन्तपरिवर्जितम् ॥ ३८ ॥
इत्यकारणके सर्गे कचति ब्रह्मरूपिणि ।
परस्यावथवाभासे नित्यात्मावयवात्मना ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
जो लोग यह मानते हैं कि धर्माधर्म ही स्वभोगार्थ करते हैं, उनके मत में कर्मनिर्मित की ज्ञान से
निवृत्ति न होने के कारण मोक्ष के अभाव की आपत्ति प्राप्त होगी, ऐसा कहता है।
यदि धर्म और अधर्म देह आदि का निर्माण करते हैं। देहादिभाव से स्थित इसका नित्य मोक्षनामकरूप
कर्म करते हैं यह कथन असमंजस है, क्योकि जो कर्म निर्मित होता है उसका पिण्ड अनित्यता नहीं
छोड़ती, यह भाव हे