Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verses 44–45
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verses 44–45 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 44,45
संस्कृत श्लोक
ततः प्रभृति भावानां सकारणकतां विना ।
सैकतादिव तैलानां न संभवति संभवः ॥ ४४ ॥
नियतिर्नायकश्चैव ब्रह्मतश्चाङ्गमात्मना ।
स्वाङ्गेन संयमयति करेणेव निजं करम् ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
आकाशात्मा उसी में आकाशरूप स्वप्नतुल्य दृश्य
का अभ्यास करता हुआ फिर स्मरण की कल्पना करता है, पुनः जन्म की और पुन: जगत् की कल्पना
करता है। इस तरह चिदाकाश में अलीक (असत्य) परम्परा को देख रहा जीव व्यष्टिभाव को प्राप्त
होकर अलीक जगज्जाल को जाग्रत और स्वप्न में देखता है, अपनी सन्निधिमात्र से स्व में अध्यस्त
कार्यकारणों को विषयों में प्रवृत्त कराता है एवं सुषुष्ति,प्रलय और मोक्ष मेँ जगत् का भक्षण करता
है। लेकिन वास्तव में न तो कुछ किसी का भक्षणीय है और न कोई भक्षक ही है