Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 66
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 66 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 66
इस समूह का संस्कृत श्लोक-संरेखण अभी परिष्कृत किया जा रहा है; नीचे इसका हिन्दी अर्थ दिया गया है।
हिन्दी अर्थ
यदि शंका उठे कि बहुत से जीवचित् के संकल्प मोघ (निष्फल) देखे जाते है, वही संवित् का
विनाश ठहरा। इससे संवित् की विनाशिता हो गई, तो इसपर कहते हैँ ।
दुष्ट (प्रमाण से सिद्ध) ओर संकल्पित वस्तु का जो पुरुष निरन्तर चिरकालतक अभ्यास करता है
वह उसे अवश्य प्राप्त करता है यदि थककर मध्य में ही उससे विरत न हो जाय | इससे सिद्ध हुआ कि
संकल्प की मोघता निर्बलतावश ही हे । कमजोर संकल्प कार्यक्षम नहीं होता इससे चित् में विनाशित्व
नहीं हे, चित् में विनाशिता मानने से सर्वत्र विनाशिता का प्रसंग प्राप्त होगा