Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 50
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 50 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
काकतालीयवत्सर्गे स्थिते त्वावृत्तिवृत्तिवत् ।
इदमित्थमिदं नेत्थमितीयं नियतिः स्थिता ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
अथवा सत्य ओर असत्य दोनों ही परमार्थ सत्य चित् मे भानरूप होने से सब कुछ सत्य ही है, अतः
ज्ञानी ओर अज्ञानी में परस्पर अविपरीतता ही है, ऐसा कहते हैं।
चूँकि परमार्थ सत्यचिति का जो जो भान जैसा-जैसा होता है वह वह सब सत्य है, इसलिए ये सब
भूत परस्पर सत्य ही हैं