Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 8
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 8 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
यथा जनशतस्वप्ननगराण्येकमन्दिरे ।
तथा जगन्ति खे भान्तिखानि नो सन्त्यसन्ति नो ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
दृश्य का न तो भूतकाल में अस्तित्व था, न वर्तमान में है और न भविष्य में रहेगा, यों त्रैकालिक
असत्ता होने से ही उसकी सकारणकता का निरास हो गया, ऐसा कहते है ।
पृथिवी आदि के अस्तित्व का संभव होता तो उसका कारण भी होता, जहाँपर पृथिवी आदि का
अस्तित्व ही नहीं है, वहाँपर उसका कारण क्या होगा ?