Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 31
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 31 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
तदोजः संप्रविश्याहं स्थितस्तदनुभूतिवत् ।
अन्तस्थत्रिजगद्रूपो यथाब्जे बीजमङ्कुरे ॥ ३१ ॥
हिन्दी अर्थ
हे सौम्य, जैसे वायु में स्थित स्पन्दसत्ता का
वायु से अतिरिक्त स्वरूप नहीं है उससे अभिन्न ही है वैसे ही चिदाकाश में स्थित जो त्रिजगत्रूप
शून्यता है उसका चिदाकाशसे पृथक स्वरूप नहीं हे, वह चिदाकाश से अभिन्न ही है