Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 9
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 9
संस्कृत श्लोक
कचन्ति नृशतस्वाप्नपुराण्येकगृहे यथा ।
न च नाम कचन्त्येवं सन्त्यसन्ति जगन्ति खे ॥ ९ ॥
हिन्दी अर्थ
ब्रह्म का जो प्रतिभास (झलक) है,
वह यह जगत् कहलाता है । इसी से समझ लीजिये कि वे पृथिवी आदि कहाँ हैं और इनका कारण
कहाँ ? क्या कहीं प्रातिभासिक घट के लिए दण्ड, चक्र आदि कारणकलाप की आवश्यकता पड़ती
है ? यह भाव है