Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, Verse 32
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Uttara (Liberation, Part 2), Sarga 144, verse 32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (उत्तरार्ध) · सर्ग 144 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
तत्र मे त्रिजगद्रूपमन्तः कचितमात्मनि ।
तथा तन्न तु तद्वाह्ये विद्यते केनचित्क्वचित् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
इससे सिद्ध हआ कि चिद्घनताका ही भ्रान्त लोगों की दृष्टि में जगत् के रूप में स्फुरण होता है,
ऐसा कहते हैं।
जैसे आकाश में घना अवकाश ही नीलरूप से स्थित है वैसे ही चित् में चैतन्य की घनता ही सर्गरूप
से स्थित है