Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 69
अइसठ्वँ सर्ग समाप्त च उनहत्तरवाँ सर्ग गणों की रुद्ररूपता, मुक्त लोगों की स्थिति, योगसे प्राणों का विलय तथा मरण से पुनः उत्पत्ति- इन सबका वर्णन ।
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- Verse 1प्राप्य तां ब्रह्महंसेहां रुद्रतां सर्व एव ते । समाजम्मुविरिजुश्व रुद्राणामुत्तमं शतम् ॥…
- Verse 2इसमें प्रथम विकल्प का अवलम्बन कर महाराज वसिष्ठजी उत्तर देते हैं। महाराज वसिष्ठजी ने कहा :…
- Verse 3मिक्षु के स्वप्न में जो जीवटादि आकार देखे गये थे वे ही शत गण कहे गये हैँ । वे ही भोग और ऐ…
- Verse 4बोधयित्वा तु तं भिक्षुं चेतसा चेतनेन च“ इत्यादि से भिक्षु के स्वप्नकृत शततम रुद्र द्वारा…
- Verse 5अनज्ञानियों में उसका दर्शन न होने पर भी मुक्तो में उसकी असम्भावना करना युक्त नहीं है, यों…
- Verse 6सर्वात्मस्वरूपता के बल से भी उन्हे सर्वविध अर्थो की सिद्धि होती है, यह कहते हैं। सर्वात्म…
- Verses 7–13इस तरह के एश्वर्य के रहते हरि, हर आदि मनुष्ययोनि्यो में अवतार तथा श्मशान मे निवास आदि का…
- Verses 14–15तो भला बतलाइये तो सही, भगवान् शंकर के लिए प्रसिद्ध उनके चरित्र के अनुकूल वेष तथा क्रिया…
- Verses 16–17इस तरह प्रश्न का समाधान देकर प्रस्तुत मौन के विषय में अवशिष्ट वक्तव्य दिखलाते हैं। हे रघू…
- Verse 18साख्य ओर योग उसकी प्राप्ति मेँ उपाय हैं, यह आगे चलकर कहने की अभिलाषा से महाराज वच्तिष्ठजी…
- Verses 19–21कर्मयोगियो का लक्षण कहते हैं। जो प्राणादि वायु के शान्त हो जाने पर पूर्ववर्णित हठयोग से अ…
- Verse 22विभिन्न रूपवाले उन दोनों का भला एक फल कैसे हो सकता है, यदि ऐसी शंका हो, तो उस पर कहते हैं…
- Verse 23यदि उनका फल एक ही है, तो भात की सिद्धि मे आग और जल के समुच्चय के सद्ृश साख्य ओर योग का सम…
- Verse 24देह में अहन्तादर्शनपूर्वक ही सब संसृतियाँ उत्पन्न होती हैं और अहन्तादर्शन में मन कारण है…
- Verse 25तब आत्मदर्शन से मन का नाश कैसे होता है, यदि ऐसी कोई शंका करे तो इस पर “आत्मा के अदर्शन से…
- Verse 26ज्ञान से मन का नाश होने पर उसके कार्य अहन्ता, ममता आदि बन्धन से लेकर मोक्षपर्यन्त सब कल्प…
- Verse 27अब उत्तम, मध्यम ओर अधम अधिकारियों के भेद से तीन मोक्ष के साधन हैं, यह शास्त्रार्थो के तात…
- Verse 28इन तीनों में मध्यम के ऊपर श्रीरामचन्द्रजी आक्षेप करते है। श्रीरामचन्द्रजी ने कहा : हे मुन…
- Verses 29–30उक्त तीनो भी उपाय मन के विनाश द्वारा ही मोक्ष के कारण होते है मरण में मनोनाश या प्राणनाश…
- Verses 31–32(7)) इस विषय में श्रुति प्रमाण भी है - (सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति" (तद्यथा प…
- Verses 33–35इसलिए केवल मरण से न मनोनाश होता है अथवा न प्राणनाश ही होता है, यह कहते हैं। जिस प्रकार सम…
- Verses 36–39ज्ञान से वासना का नाश कैसे होता है, इस शंका पर उसके हेतुभूत द्वैत के बाध से, यह उत्तर देत…
- Verses 40–41अब प्रस्तुत विषय का अवलम्बन करते हैं। भद्र, श्रवण आदि से अद्रय तत्त्व का अभ्यास, प्राणनिर…
- Verses 42–50देह के अस्तित्व में जब प्राण का उत्क्रमण हो तव आपका यह क्रम भले ही रहे परन्तु शाप, छेदन आ…
- Verses 51–52कितने काल तक एकतत्त्व में भावना करनी चाहिए, इस पर कहते है । भद्र, एक सुदृढ़ आत्मतत्त्व मे…
- Verses 53–57यम, नियम, आसन, प्राणायाम ओर प्रत्याहार इन योग के पाँच अगो से पहले मन के बाह्याकार का विना…
- Verse 58यही प्रस्तुत साख्य ओर योग का अभिन्न फल है, यह कहते हैं। हे रामभद्र, यदि आपका चित्त सांख्य…
- Verse 59अव महाराज वस्निष्ठजी स्वयं ही सतत्वशब्द का निर्वचन करते हैं। जिसमें से अविद्या गल चुकी है…
- Verse 60सांख्ययोग द्वारा आत्मदर्शन में तत्पर मनुष्य विरले ही हैं, ऐसा कहते है । कोई एक-आध ही-जिसक…
- Verse 61उक्तार्थ का ही अनुवादपूर्वक उपसंहार करते हैं। हे भाग्यवान्, पूर्वोक्त तीनों उपायों के अभ…