Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 53–57

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 53–57 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 53-57

संस्कृत श्लोक

यदेकतानं भवति चेतस्तद्भवति क्षणात् । शान्ताशेषविशेषौघं चिराभ्यासस्वभावतः ॥ ५३ ॥ अविद्येयं तु नास्तीति बुद्ध्वा युक्तियुतं धिया । ज्ञानादेव परावाप्तिस्तदभ्यासस्ततः परम् ॥ ५४ ॥ चित्ते शान्ते शाम्यतीयं संसारमृगतृष्णिका । जरामुपगते मेघे मिहिका तन्मयी यथा ॥ ५५ ॥ चित्तमात्रमविद्येति कुरु तेनैव तत्क्षयम् । तद्रूपं राम चित्तात्मा नाभावो हि परं पदम् ॥ ५६ ॥ मुहूर्तमेव निर्वाणं यदि चेतः परे पदे । तत्तत्परिणतं विद्धि तत्रैवास्वादमागतम् ॥ ५७ ॥

हिन्दी अर्थ

यम, नियम, आसन, प्राणायाम ओर प्रत्याहार इन योग के पाँच अगो से पहले मन के बाह्याकार का विनाश हो जाने पर, अनन्तर धारणा, ध्यान ओर समाधि - इन तीनों से ब्रह्मैकाग्रता की प्राप्ति द्वारा निर्विकल्प समाधि के परिपाक से ब्रह्मरूपता की सिद्धिहो जाती है । चित्त जिस किसी वस्तु में रम जाता है, तद्रूप ही वह शीघ्र बन जाता है, अतः दीर्घकाल तक आत्मतत्त्व के अभ्यासस्वभाव से वह समस्त विशेषो से शान्त होकर निर्विशेष ब्रह्मरूप ही हो जाता है । जो कभी सुना नहीं गया है, जो कभी माना नहीं गया है, उसमें ध्यान, धारणा, आदि से अभ्यास नहीं हो सकता, इसलिए श्रवण और मनन से पहले “समस्त द्वितप्रपच अविद्यारूप ही है, यह सर्वथा असत्‌ है, तत्त्वज्ञान से ही आत्मतत्त्व की प्राप्ति होती है", इसका तब तक परिज्ञान करे जब तक कि प्रमाणप्रमेय के असम्भावनादि दोष निरस्त न हो जाय । अनन्तर ध्यान, धारण आदि से ज्ञानाभ्यास करना चाहिए । चित्त के शान्त हो जाने पर यह संसाररूपी मृगतृष्णा उस प्रकार विलीन हो जाती है, जिस प्रकार शरत्‌-काल में मेघमण्डल के शिथिल हो जाने पर मेघ मण्डल से आगत तन्मय कुहरा विलीन हो जाता है । हे रामजी, केवल चित्त तो अविद्यारूप है, इसलिए ब्रह्माकार से परिणत चित्त से ही उसका विनाश कीजिये। चित्त के क्षय का असली स्वरूप चित्ताधिष्ठान आत्मा ही है, शून्यता नहीं; इसलिए चित्त का अभाव परम पुरुषार्थ नहीं हो सकता । यदि परमपद में चित्त मुहूर्तमात्र भी विश्रान्त हो जाय, तब तो वह ब्रह्मरूप मेँ ही परिणत हो गया, यह आप जान लीजिए । अध्यस्त पदार्थ का अधिष्ठान से पृथक्‌ स्वरूप नहीं होता, इसलिए ब्रह्मरूप अधिष्ठान में ही निरतिशय स्वप्रकाश ओर आनन्द का अनुभव कर रहा वह कभी भी व्युत्थान नहीं चाहता (५)