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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 31–32

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 31–32 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 31,32

संस्कृत श्लोक

वासनासात्मकान्येव विद्धि तन्मात्रकाणि वै । तदात्मकैर्मनोवद्भिः प्राणैः श्लिष्यन्ति नेतरैः ॥ ३१ ॥ सवासनास्तूत्पद्यन्ते प्राणा मुञ्चन्ति देहकम् । तद्व्योमवायुसंश्लेषं यान्ति दुःखाय गन्धवत् ॥ ३२ ॥

हिन्दी अर्थ

(7)) इस विषय में श्रुति प्रमाण भी है - (सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति" (तद्यथा पेशस्कारी पेशसो मात्रामुपादायान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं तनुते एवमेवायमात्मेदं शरीरं निहत्याविद्यां गमयित्वान्यन्नवतरं कल्याणतरं रूपं कुरुते” तब वे भूतमात्रा बाहर के अन्यजीवो के प्राणों के साथ सम्बद्ध क्‍यों नहीं होतीं ? इस शंका पर कहते हैं। तत्‌-तत्‌ जीववासनामात्रस्वरूप वे भूतमात्राएँ हैं। अत: उक्त वासनावाले मनोविशिष्ट प्राणों से ही वे सम्बद्ध होती हैं, दूसरों से नहीं, अतः उक्त शंका का प्रकृत में कुछ भी अवसर नहीं है। दूसरे शरीर में जो प्राण उत्पन्न होते हैं, वे पूर्व शरीर की वासनाओं से युक्त होकर ही उत्पन्न होते हैं । और पूर्व देह का जो परित्याग करते हैं, वे भी भावी देह की वासनाओं से युक्त होकर ही परित्याग करते हैं । देहान्तर में उसके हृदयाकाश ओर उसके अन्तर्गत वायुओं से उस प्रकार श्लिष्ट होते हैं, जिस प्रकार पुष्पों की गन्ध तिल में प्रविष्ट होकर तेल के साथ श्लिष्ट हो जाती है । इसी प्रकार यन्त्रनिष्पीडन दुःख की नाई केवल दुःख ही है