Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 3
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verse 3 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 3
संस्कृत श्लोक
य आकाराश्च ते स्वप्ने तत्तद्गणशतं स्मृतम् ।
तदेतद्रुद्रशतकं रुद्रा अपि गणा विधौ ॥ ३ ॥
हिन्दी अर्थ
मिक्षु के स्वप्न में जो जीवटादि आकार देखे गये थे वे ही शत गण कहे गये हैँ । वे ही भोग और
ऐश्वर्य के द्वारा सुद्रतुल्य होने तथा रुद्र के अशस्वरूप होने से सद्र कहे गये हैं। रुद्र की सेवा
करनेवाले पार्षद गण कहे जाते हैं, तब वे मुख्यरुद्र गण कैसे हुए ? क्योकि स्वामिभाव और सेवकभाव-
इन दोनों का एकत्र रहना सर्वथा असम्भव है । किंतु, यह निश्चित है कि शततमरुद्र के मुख्य होने
के कारण वह तो गण हो नहीं सकता, फिर सौ गण हुए, यह कहना भी ठीक नहीं बनता, यदि ऐसी
कोई शंका करे, तो उस पर कहते हैं ।
सौ रुद्र होते हुए भी सबके सब पूर्वसिद्ध ईश्वरकोटिभूत रुद्र की परिचर्याविधि में गण ही हैं, क्योकि
उनकी कर्मफलस्वरूप भोग ओर ऐश्वर्य की प्राप्ति उसीके अधीन है