Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 51–52
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 51–52 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 51,52
संस्कृत श्लोक
एकस्मिन्सुदृढे तत्त्वे तावद्भावं विभावयेत् ।
भावोऽभावत्वमायाति स्वभ्यासाद्यावदाततम् ॥ ५१ ॥
प्रत्याहारवतां चेतः स्वयं भोग्यक्षयादिव ।
विलीयते सह प्राणैः परमेवावशिष्यते ॥ ५२ ॥
हिन्दी अर्थ
कितने काल तक एकतत्त्व में भावना करनी चाहिए, इस पर कहते है ।
भद्र, एक सुदृढ़ आत्मतत्त्व में तब तक तदाकारवृत्तिधारा करनी चाहिए जब तक कि वह वृत्तिधारा
अभ्यासजनित अन्तिम साक्षात्कार से पूर्व अभावरूप न बन जाय | निग्रहवृत्ति से युक्त पुरुषों का
चित्त, आहारक्षय से शरीरक्षय की नाई, स्वयं ही प्राणों के साथ विलीन हो जाता है ओर परमतत्त्व
अवशिष्ट रह जाता हे