Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 19–21

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 19–21 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 19-21

संस्कृत श्लोक

प्राणाद्यनिलसंशान्तौ युक्त्या ये पदमागताः । अनामयमनाद्यन्तं ते स्मृता योगयोगिनः ॥ १९ ॥ उपादेयं तु सर्वेषां शान्तं पदमकृत्रिमम् । तत्केचित्संख्यया प्राप्ताः केचिद्योगेन देहतः ॥ २० ॥ एकं सांख्यं च योगं च यः पश्यति स पश्यति । यत्सांख्यैः प्राप्यते स्थानं परं योगैस्तदेव हि ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

कर्मयोगियो का लक्षण कहते हैं। जो प्राणादि वायु के शान्त हो जाने पर पूर्ववर्णित हठयोग से अनामय, आदि-अन्त से रहित परमपद को प्राप्त हो गये हैं वे योगयोगी कहे गये हैं | वह शान्त, अकृत्रिम पद दोनों तरह के भी योगियों के लिए उपादेय है यानी फलीभूत तत्त्वसाक्षात्कार से प्राप्तव्य है । कुछ लोग उस पद को राजयोग द्वारा प्राप्त हो चुके हैँ ओर कुछ लोग इसी देह से हठयोग के द्वारा प्राप्त हो चुके हैं । भद्र, जो सांख्य ओर योग को एक देखता है, वही देखता है यानी जो सांख्य ओर योग को एक समझता है वस्तुतः वही विद्वान्‌ है, क्योंकि जो उत्कृष्ट स्थान सांख्यो से प्राप्त किया जाता है वही योगों से भी प्राप्त किया जाता हे