Guru's AddaGuru's Adda

Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 29–30

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 29–30 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 29,30

संस्कृत श्लोक

श्रीवसिष्ठ उवाच । त्रिष्वेतेषु प्रयोगेषु मनःप्रशमनं वरम् । साध्यं विद्धि तदेवाशु यथा भवति तच्छिवम् ॥ २९ ॥ यदा निर्वाणनं प्राणास्त्यजन्तीदं शरीरकम् । तदानुभूय तन्मात्रैर्यान्ति व्योमनि संगमम् ॥ ३० ॥

हिन्दी अर्थ

उक्त तीनो भी उपाय मन के विनाश द्वारा ही मोक्ष के कारण होते है मरण में मनोनाश या प्राणनाश नहीं होता, किन्तु वहाँ पर मूच्छाकाल में, विलीन सैन्धव की नाई अविद्या में वासनारूप से उनकी स्थिति रहती है और उत्क्रमणकाल में फिर उनका आविर्भाव हो जाता है । एवं (सविज्ञानो भवति सविज्ञानमेवान्ववक्रामति" इस श्रुति से तथा तृणजलायुका का दृष्टान्त होने से विलीन प्राण चक्षु आदि द्वारो से निकल नहीं सकते । यदि शंका हो कि स्थूल देहरूप आश्रय न होने के कारण बाहर में निकले हुए प्राणो का विलय हो जायेगा तो यह युक्त नहीं है, क्योकि बाह्याकाश में साथ- साथ निकली हुई भूतमात्राओं से तात्कालिक व्यवहारयोग्य देह की कल्पना हो सकती है, इस आशय से वस्तिष्ठजी समाधान करते है। महाराज वसिष्ठजी ने कहा : भद्र, इन तीनों उपायों मेँ मनोविनाश ही मुख्य साध्य हे । मनोविनाश जितना ही शीघ्र होगा उतना ही शीघ्र कल्याण होगा, यह आप जान लीजिये । प्राण जब घर-घर आदि शब्दों से शून्य इस शरीर का परित्याग करते हैं तब वासना एवं कर्म से होनेवाले भावी देहस्वरूप का अनुभव कर बाह्याकाश में उसी देह के उत्पादन में समर्थ भूतमात्राओं से वे सम्बन्ध करते हैं (८)