Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 36–39
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 36–39 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 36-39
संस्कृत श्लोक
ज्ञानात्सर्वपदार्थानामसत्त्वं समुदेत्यलम् ।
ततोऽङ्ग वासनानाशाद्वियोगः प्राणचेतसोः ॥ ३६ ॥
ततो न पश्यति मनः प्रशान्तं देहतां पुनः ।
स्वनाशेन पदं प्राप्तं वासनैव मनो विदुः ॥ ३७ ॥
चेतो हि वासनामात्रं तदभावे परं पदम् ।
तत्त्वं संपद्यते ज्ञानं ज्ञानमाहुर्विचारणम् ॥ ३८ ॥
इत्यस्याः संसृते राम पर्यन्तः संप्रवर्तते ।
स्वयं विवेकमात्रेण रज्जुसर्पभ्रमाकृतेः ॥ ३९ ॥
हिन्दी अर्थ
ज्ञान से वासना का नाश कैसे होता है, इस शंका पर उसके हेतुभूत द्वैत के बाध से, यह उत्तर देते हैं ।
ज्ञान से सभी पदार्थो में असत्यत्व भलीभाँति पहले सिद्ध हो जाता है ओर तदनन्तर हे भद्र, वासना
के विनाश से प्राण ओर चित्त का विनाश हो जाता है । अनन्तर प्रशान्त मन फिर देहरूपता नहीं देखता,
अपने (मन के) विनाश से ही पूर्ण पद प्राप्त हो जाता है, अतः मुनिगण वासना को ही मन जानते हे ।
यतः चित्त का स्वरूप केवल वासना ही है, अतः (तत्त्वज्ञान से) चित्त का बाध हो जाने पर उत्तम स्थिति
प्राप्त हो जाती हे । तत्त्वज्ञान भी वासना के साथ-साथ सभी पदार्थो का बाध करते आत्मतत्त्वरूप बन
जाता है ओर आत्मतत्त्व भी अविचल ज्ञानरूप ही है, यह अनुभवी विद्वानों का मत हे । हे रामभद्र, इन
सब बातों से निचोड़ यह निकला कि रज्जु में सर्पभ्रम के सदृश मिथ्यारूप इस संसार का स्वयं ही
विवेकज्ञानमात्र से अच्छी तरह विनाश हो जाता है