Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 61
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verse 61 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 61
संस्कृत श्लोक
विगलितात्मपदं विगलन्मनः सुभग सत्त्वमितीह हि कथ्यते ।
न पुनरेति कलामलिनं पदं कनकतामिव ताम्रमुपागतम् ॥ ६१ ॥
हिन्दी अर्थ
उक्तार्थ का ही अनुवादपूर्वक उपसंहार करते हैं।
हे भाग्यवान्, पूर्वोक्त तीनों उपायों के अभ्यास से जाग्रत्, स्वप्न तथा सुषुप्तिरूप भ्रान्ति और
तज्जनित अन्य-अन्य दर्शनों से रहित तथा अविद्या के विनाश से दग्धवस्त्र के सदृश प्रतिभासमात्ररूप
से स्वयं अवशिष्ट मन जीवन्मुक्तावस्था में "सत्त्व" कहा जाता हे । वह वासनारूप बीजशक्ति के विनष्ट
हो जाने से रागद्वेष, अभिमान आदि कलाओं से मलिन संसारपद को उस प्रकार प्राप्त नहीं होता,
जिस प्रकार पारसमणि के सम्बन्ध से सुवर्णरूपता को प्राप्त हुआ ताम्र फिर कलंकरूप कला से मलिन
ताम्ररूपता को प्राप्त नहीं होता