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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verses 40–41

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verses 40–41 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 40,41

संस्कृत श्लोक

एकार्थाभ्यसनप्राणरोधचेतःपरिक्षयाः । एकस्मिन्नेव संसिद्धे संसिद्ध्यन्ति परस्परम् ॥ ४० ॥ तालवृन्तस्य संस्पन्दे शान्ते शान्तो यथानिलः । प्राणानिलपरिस्पन्दे शान्ते शान्तं तथा मनः ॥ ४१ ॥

हिन्दी अर्थ

अब प्रस्तुत विषय का अवलम्बन करते हैं। भद्र, श्रवण आदि से अद्रय तत्त्व का अभ्यास, प्राणनिरोध ओर मनोविनाश - ये जो तीन उपाय हैं, इनमें से किसी एक की ही सिद्धि हो जाने पर एक दूसरे सिद्ध हो जाते हैं । ताल के पत्तों से निर्मित पंखे का स्पन्द जब शान्त हो जाता है, तब अपने-आप जैसे पवन शान्त हो जाता हे, वैसे ही जब प्राणरूप वायु का स्पन्दन शान्त हो जाता है, तब मन भी अपने-आप शान्त हो जाता है