Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 5
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verse 5 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
निरावरणसद्भावा यद्यथा कल्पयन्ति हि ।
तत्तथानुभवन्त्येव रसावरणसंविदः ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
अनज्ञानियों में उसका दर्शन न होने पर भी मुक्तो में उसकी असम्भावना करना युक्त नहीं है, यों
खण्डन करते हैं।
महाराज वसिष्ठजी ने कहा : हे श्रीरामचन्द्रजी, ज्ञानैश्वर्य से आवरणशून्य तथा योगरूप ऐश्वर्य से
सत्यसंकल्पवाले महानुभाव जो कुछ जिस प्रकार से संकल्प करते हैं उसका वैसा ही-संकल्पित अर्थ के
लाभ के लिए भूमानन्द को स्वीकार करनेवाली सर्वज्ञत्वसर्वशक्तित्वनामक मायाप्रतिबिम्बित संवित्ति
के बल से-अनुभव करते हैं