Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, Verse 1
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 69, verse 1 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 69 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीराम उवाच ।
कुतः शतत्वमायातं रुद्राणां मुनिनायक ।
ये गणास्ते तु ये रुद्रा उत नेति वदाशु मे ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
प्राप्य तां ब्रह्महंसेहां रुद्रतां सर्व एव ते । समाजम्मुविरिजुश्व रुद्राणामुत्तमं शतम् ॥
इस श्लोक से सौ रुद्रो की उत्तम रूद्रता कही जा चुकी है । उसके बाद के सर्ग मे भगवान् आदि
रुद्र की आज्ञा से तत्-तत् देहो मे प्रारब्धशेष का उपभोग कर रहे रुद्रो के विषय में - तत्र भुक्त्वा
(&) यह तुरीयावस्था उपनिषद् में इस प्रकार वर्णित है : नान्तःप्रज्ञं न बहिःप्रज्ञं नोभयतः प्रज्ञं
न प्रज्ञानघनं न प्रज्ञं नाप्रज्ञम् । अदृष्टमव्यवहार्यमग्राह्यमलक्षणमचिन्त्यमव्यपदेश्यमेकात्मप्रत्ययसारं
प्रपंचोपशमं शान्तं शिवमद्वैतं चतुर्थ मन्यन्ते स आत्मा स विज्ञेयः ॥ अर्थात् तुरीय उस पद का नाम
है जो स्वप्नावस्था में मनोविरचित विषयज्ञान से शून्य है, जाग्रत अवस्था में इन्द्रियजन्य विषयज्ञानशून्य
है, जाग्रत् ओर स्वप्न की सन्धि में बोधरहित है, सुषुप्तावस्था में होनेवाले जाग्रत् ओर स्वप्न के
ज्ञानो के घनीभाव से शून्य है, युगपत् सर्व विषयों के ज्ञातृत्व से शून्य है, ज्ञानाभावरूप नहीं है,
ज्ञानेन्द्रिय का अविषय है, अर्थक्रियारहित है, कर्मेन्द्रिय का अगम्य है, अननुमेय है, अन्तःकरणवृृत्ति
का अविषय है, शब्दशक्ति का अविषय है, जिसमें जाग्रदादि अवस्थाओं मेँ एक आत्मा ही है, इस
प्रकार का ज्ञान ही प्रमाण है, जहाँ प्रपंच का अभाव विद्यमान है, जो विक्रियारहित है, आनन्दस्वरूप
है, भेदशून्य है, स्वयं संख्याशून्य होता हुआ भी विश्वतैजसप्राज्ञरूप तीन पादों की अपेक्षा चौथे रूप
से शास्त्रवेत्ताओं के द्वारा कल्पित है । “मैं” इस प्रतीति का विषय वह आत्मा मुमुक्षुजनों को साक्षात्
करने योग्य है |
चिरं भोगान् प्राप्य रुद्रपदं ततः । गणतामावसन्तस्ते स्थास्यन्ति सपरिच्छदाः ॥ इत्यादि जो कहा गया
है, उसमें क्या सौ रुद्रो की मूर्तियों में गणत्व था या एक ही सुद्र की मूर्ति थी ? यों सन्देह कर रहे
श्रीरामचन्द्रजी पूछते हैं ।
हे मुनिनायक, आपने पहले कहा था कि वे भिक्षु के संकल्पस्वरूप जीवट आदि सौ रुद्र हो गये, सो
उनमें शतरुद्रता कैसे आई ? यानी वे सौ रुद्र कैसे हुए ? क्या गणो के साथ परिगणन करने से या उन
गणो से अतिरिक्त रुद्रो की गणना करने से ? जो आपके द्वारा गण कहे गये थे क्या वे ही रुद्र भी कहे गये
थे या नहीं ? यह आप शीघ्र मुझसे कहिये
सर्ग सन्दर्भ
अइसठ्वँ सर्ग समाप्त च उनहत्तरवाँ सर्ग गणों की रुद्ररूपता, मुक्त लोगों की स्थिति, योगसे प्राणों का विलय तथा मरण से पुनः उत्पत्ति- इन सबका वर्णन ।