Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1) · Sarga 54
तिरपनवाँ सर्ग समाप्त चौवनवाँ सर्ग सुख, दुःख आदि के सम्बन्ध में हेतु, उनसे छुटकारा पाने का उपाय तथा जिसके अवलम्बन से उनसे छुटकारा होता है-इन सबका वर्णन ।
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- Verse 1“सुख, दुःख आदि दन्द्रो से विनिर्मुक्त महात्मा ब्रह्मपद पाते है" यह जो पहले कहा गया है, उस…
- Verse 2उसमें पहले (विषय ही सुख-दुःखरूप हैं” यों अभेद- भ्रम का निरास कर रहे भगवान् कहते हैं। हे…
- Verse 3(यहाँ शीत और उष्ण शब्द दुष्टान्तार्थक हैं यानी ग्रीष्मकाल मे शीत सुखद है ओर उष्ण दुःखद है…
- Verse 4जिस महामति की विषयों ओर इन्द्रियो मे सत्यता-भ्रान्ति उपशान्त हो जाती है, वह इन्द्रियविषय…
- Verse 5यदि शंका हो कि अप्रिय दुःख आदि अपने-अपने प्रतिकूल वेदनीयत्वस्वभाव का जब परित्याग करें, तभ…
- Verse 6उसीका स्पष्टीकरण कर समर्थन करते हैं। सभी तरह से सुख-दुःखों का अस्तित्व तनिक भी नहीं हे ।…
- Verse 7असत् भी सुख. दुःख आदि आत्मा में उत्पन्न होते है, क्योकि असत् का अपने कारण में समवाय, अप…
- Verse 8जगत् सत्य हे, ओर निरतिशय आनन्द- स्वरूप ब्रह्म असत्य है-इन बुद्धियों को छोड़कर तथा जगत्…
- Verse 9हे अर्जुन, यद्यपि आत्मा हर्ष, ग्लानि आदि दृश्य पदार्थो का साक्षिरूप से साक्षात्कार करनेवा…
- Verse 10तव फिर कौन दु:ख, हर्ष आदि का भागी होता है ? इस पर कहते है। पार्थ, शरीररूपता को प्राप्त हु…
- Verse 11प्रिय पार्थ, देह आदि दुःख आदि के भोक्तारूप से जो यह चित्तादिघटित जडताप्रधान जीवरूप अवस्थि…
- Verse 12अतः आत्मा से पृथक्भूत देह आदि कुछ भी नहीं हैं और न दुःख आदि ही अपनी कुछ सत्ता रखते हैं, अ…
- Verse 13हे भारत, चूँकि दृश्यमान यह दुःख ब्रह्म के अज्ञान से जनित एक प्रकार की भ्रान्ति ही है, अतः…
- Verse 14जिस प्रकार रज्जु के अज्ञान से उत्पन्न हुआ रज्जु में सर्पभय रज्जु के यथार्थज्ञान से नष्ट ह…
- Verse 15वह बोध किस प्रकार का है ? यह कहते हैं। यह विश्व नित्य एवं पूर्ण ब्रह्मरूप ही है, वह न तो…
- Verse 16कोन्तेय, ब्रह्मरूपी महान् सागर में कुछ तरंगरूप उत्पन्न होकर विलीन हो जाता है, आज बोधोदयक…
- Verse 17काल, क्रिया, देश, तुम, मैं आदि जितने पदार्थ हैं, वे सबके सब उस सम्राट् के भी सम्राट् पर…
- Verse 18अर्जुन, तुम मान, मद, शोक, भय, इच्छा, सुख, दुःख - यह सम्पूर्ण असद्रूप द्वैतप्रपंच छोड़ दो…
- Verse 19तुम्हारे द्वारा किया जानेवाला अक्षौहिणी सेना का विनाश भी ब्रह्मरूप ही है, अतः क्षयात्मना…
- Verse 20हे भारत, सुख, दुःख, लाभ, हानि, जय ओर पराजय किसी पर भी दृष्टि न देकर युद्ध कर रहे तुम एकमा…
- Verse 21लाभ ओर अलाभ में समबुद्धि होकर तत्त्वनिश्चय से देहादिरूप न होकर, गुहापरिच्छिन्न वायु के सद…
- Verse 22सव कुछ ब्रह्मरूप ही है, इस निश्चय में स्थिर रहना ही समस्त कर्मो को मेरे अर्पण करना है, इस…
- Verse 23जो पुरुष अपने हृदय के भीतर जिस किसी आकार से युक्त होता हे यानी अपने चित्त में जिस स्वरूप…
- Verse 24पार्थ, जिसे ब्रह्मज्ञान हो चुका है, वह स्वयं ही - सम्पूर्ण कामनाओं की जिसमें परिसमाप्ति र…
- Verse 25जो पुरुष, उक्त रीति से कर्म मे अकर्म देखता है यानी निष्क्रिय ब्रह्म का अवलोकन करता है ओर…
- Verse 26हे धनंजय, प्रवृत्ति में निमित्तभूत लाभादिरूप कर्म-फल से युक्त मत होओ ओर अकर्म में यानी प्…
- Verse 27कर्मो में आसिक्त का आश्रय न कर, तत्त्वदृष्टि में प्रमाद का आश्रय न कर और नैष्कर्म्य का भी…
- Verse 28कर्मफलं मे आसक्ति छोडकर जो पुरुष नित्यतृप्त ओर निराश्रय होकर स्थित रहता हे, वह कर्म में भ…
- Verse 29विद्वान् लोग आसक्ति को ही कर्तृत्व कहते हैं, मन में प्रमाद रहने पर कर्म न करनेवाले पुरुष…
- Verse 30तत्त्वज्ञान से प्रमाद नष्ट हो जाने पर तो आसक्ति नहीं टिकती, अतः आसक्तिराहित उस पुरुष में…
- Verse 31अकर्तृत्व सिद्धि से भूमिका क्रम के अनुसार विदेह कैवल्य तक की सिद्धि हो जाती है, यह कहते ह…
- Verse 32हे अर्जुन, अनेकतारूपी मल का उत्सर्ग करके परमात्मा के साथ एकत्व प्राप्त कर तुम कार्य या अक…
- Verse 33जिस पुरुष, के सभी कर्म कामसंकल्प से वर्जित हैँ अतएव ज्ञानरूपी अग्नि से दग्ध कर्मवाले उस प…
- Verse 34जो सम, सौम्य, स्थिर, स्वस्थ, शांत और सब पदार्थो से निस्पृह होकर अवस्थित रहता है, वह कर्मय…
- Verse 35हे पार्थ, सुखदुःख, रागद्वेष आदि द्वन्द से निर्मुक्त, नित्य सत्त्वस्थ, योग एवं क्षेम से शू…
- Verse 36सब कर्मो का त्याग करने पर भी यदि मन में विषयों के प्रति आसक्ति बनी रहे तो वह त्याग दाम्भि…
- Verse 37ओर जो मनसहित सभी इन्द्रियों का निग्रह करता है, वह शास्त्रानुसार विहित कर्मों को करता हुआ…
- Verse 38इससे यह सिद्ध हुआ कि सम्पूर्ण इन्द्रियों का निग्रह कर चुके संन्यासी को ही, सम्पूर्ण इच्छा…