Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 29
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 29 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
आसक्तिमाहुः कर्तृत्वमकर्तुरपि तद्भवेत् ।
मौर्ख्ये स्थिते हि मनसि तस्मान्मौर्ख्यं परित्यजेत् ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
विद्वान् लोग
आसक्ति को ही कर्तृत्व कहते हैं, मन में प्रमाद रहने पर कर्म न करनेवाले पुरुष को वह आसक्ति
अवश्य होती है, अतः मूर्खता का परित्याग कर देना चाहिए, क्योकि मूर्खता से ही अनर्थपरम्परा
होती है