Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 23
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 23 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
यन्मयो यो भवत्यन्तः स तदाप्नोत्यसंशयम् ।
ब्रह्मसत्यमवाप्तुं त्वं ब्रह्मसत्यमयो भव ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष अपने हृदय के भीतर जिस किसी आकार से युक्त होता हे
यानी अपने चित्त में जिस स्वरूप की दृढ भावना कर लेता है, वह निःसंशय उसे प्राप्त कर लेता
है - यह नियम है । इसलिए हे अर्जुन, ब्रह्मस्वरूप सत्य को प्राप्त करने के लिए तुम ब्रह्मरूप
सत्यमय हो जाओ यानी निरंतर अपने हृदय में ब्रह्माकार की भावना करो