Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 10
This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 10 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.
निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 10
संस्कृत श्लोक
जडं चित्तादि दुःखस्य भाजनं देहतां गतम् ।
न चैतस्मिन्क्षते क्षीणे किंचिदेवात्मनः क्षतम् ॥ १० ॥
हिन्दी अर्थ
तव फिर कौन दु:ख, हर्ष आदि का भागी होता है ? इस पर कहते है।
पार्थ, शरीररूपता को प्राप्त हुए जडस्वरूप चित्त आदि ही दुःख के भागी होते हैं । इन चित्त
आदि के नष्ट या क्षीण होने पर आत्मा का कुछ भी नष्ट नहीं होता