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Yoga Vasistha — Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, Verse 9

This page presents the Yoga Vasistha (Yogvashistha), Nirvana Prakarana Purva (Liberation, Part 1), Sarga 54, verse 9 — the original Sanskrit shloka(s) with their Hindi meaning.

निर्वाण प्रकरण (पूर्वार्ध) · सर्ग 54 · श्लोक 9

संस्कृत श्लोक

न हृष्यति सुखैरात्मा दुःखैर्ग्लायति नोऽर्जुन । दृश्यदृक्वेतनात्मापि शरीरान्तर्गतोऽपि सन् ॥ ९ ॥

हिन्दी अर्थ

हे अर्जुन, यद्यपि आत्मा हर्ष, ग्लानि आदि दृश्य पदार्थो का साक्षिरूप से साक्षात्कार करनेवाला चितिस्वरूप है और शरीर के अन्दर रहता भी है, तथापि वह सुखो सेन तो हर्षित होता है और न दुःखों से म्लान ही होता है| तात्पर्य यह है कि हर्ष आदि दृश्य पदार्थ द्रष्टा के धर्म नहीं हो सकते